कविता
💐था कहीं काला धुँआ💐
दोष किसको दें किसे दें माफियां,
किस तरफ तोड़ी गयी इंसाफियां,
झूठ का बनता किला ढहता नहीं,
हो रही नित रोज क्यों गुस्ताखियाँ,
है नहीं कुछ बात लेकिन बात तो है,
है छुपा उर में कहीं आघात तो है,
हो रही क्यों दूरियां कौन जिम्मेदार है,
छुप नहीं सकती महक ये ज्ञात तो है,
आदमी की आदमी से छिड़ गयी क्यों,
दूरियों की बेल विष की बढ़ गयी क्यों,
वे गिराना चाहते है जूथ में होकर इकट्ठे,
फासले की फसल पनपी बढ़ गयी क्यों,
समझते तुम भी नहीं मानता वह भी नहीं,
खबर पक्की है सुनो जानता कोई नही,
दूरियाँ बढ़ती गयीं एक दिवस गए हार,
यहाँ रहो मत रहो पहचानता वह भी नहीं,
था कहीं काला धुँआ आ नहीं पाया नजर
सुबह पूरी ढल गयी अब आ गयी है दोपहर,
इस तरह से समय घटता जा रहा है देख लो
कब समय हो जाये पूरा वक्त है प्यार कर,
तोड़ दो बंधन सको जो तोड़ भृम जंजाल,
है बगल में आ खड़ा है मित्र प्यारे काल,
समय की बात जो तू समझ पाता ध्यान से,
हर तरफ हर ओर खाली आदमी कंगाल,
शिव शंकर झा "शिव"
स्वतन्त्र लेखक
व्यंग्यकार
शायर
१०.०४.२०२२ ०४.०२ अपराह्न